सुरेश जी की कलम से : जल संरक्षण पर आलेख

1 year ago
अपना संस्थान

राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ ने सामाजिक सरोकारों के तहत अब प्रदेश भर में पर्यावरण बचाने की मुहिम वृक्षारोपण एवं जल संरक्षण की मुहिम एवं जनभावना शुरू की है।
संघ विचारधारा के अनुसार विश्व में बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को देखते हुए वृक्षारोपण एवं जल संरक्षण का यह अभियान शुरू किया गया है। इसके लिए अपना अर्थात ‘अ’ से अमृता देवी ‘प’ से पर्यावरण और ‘ना’ से नागरिक संस्थान की स्थापना की है। वायुमंडल पर्यावरण के  तहत जल संरक्षण भी एक मुख्य अव्यव आता है।
*जल संरक्षण कीजिए, जल जीवन का सार*।
*जल न रहे यदि जगत में, जीवन है बेकार*।।
संसार के प्रत्येक प्राणी का जीवन आधार जल ही है। शायद ही ऐसा कोई प्राणी हो जिसे जल की आवश्यकता न हो। सनातन हिन्दु धर्म संस्कृति ने अपने पंचतत्वो मे जल को देवता माना है। इसलिये हमारे ऋषि- मुनियो ने कहा है:-
आपो नारा इति प्रोक्ता, नारो वै नर सूनवः।
अयनं तस्य ताः पूर्व, ततो नारायणः स्मृतः ।।

अर्थात ‘आपः’ (जल के विभिन्न प्रकार) को ‘नाराः’ कहा जाता है क्योंकि वे ‘नर’ से उत्पन्न हुए हैं। चूँकि ‘नर’ का मूल निवास ‘जल’ में है। इसीलिये जल में निवास करने वाले (जल में व्याप्त) ‘नर’ को ‘नारायण’ कहा जाता है।जल हमें समुद्र, नदियों, तालाबों, झीलों, वर्षा एवं भूजल के माध्यम से प्राप्त होता है। गर्म हवाओं के चलने से समुद्र, नदियों, झीलों, तालाबों का जल वाष्पित होकर ठंडे स्थानों की ओर चलता है जहाँ पर न्यून तापमान के कारण संघनित होकर वर्षा के रूप में पृथ्वी पर गिरता है। जबकि पहाड़ों पर और भी कम तापमान होने के कारण जल बर्फ के रूप में जम जाता है जोकि गर्मी के दिनों में पिघलकर नदियों में चला जाता है।

मानव अपने स्वास्थ्य, सुविधा, दिखावा व विलासिता को दिखाने के लिये अमूल्य जल की बर्बादी करने से नहीं चूकता है। पानी का इस्तेमाल करते हुए हम पानी की बचत के बारे में जरा भी नहीं सोचते हैं।  परिणामस्वरूप अधिकांश जगहों पर जल संकट की स्थिति पैदा हो चुकी है। यदि हम अपनी आदतों में थोड़ा-सा भी बदलाव कर लें तो पानी की बर्बादी को रोका जा सकता है। *अपना संस्थान* पर्यावरण एवं जल संरक्षण के उद्देश्यों की पुर्ति के लिये जनजागरण के माध्यम से जनता को प्रेरित कर रहा है, दृढ़संकल्प करा रहा है,  तथा जल संरक्षण पर गंभीरता से अमल करने की भागीरथी प्रयास कर रहा है , क्योंकि जल है तो हमारा भविष्य है। इसलिए यदि हम पानी की बचत करते हैं तो यह भी जल संग्रह का ही एक स्वरूप है। विद्वानों के  अध्ययन से पता चला है कि मानव यदि अपनी आदतों को बदल लें तो 80 प्रतिशत से भी अधिक पानी की बचत हो सकती है। इस संरक्षण क्षेत्र मे आम आदमी बडा सहयोग नहीं अपनी कुछ ही आदत बदल लें तो भी 15 प्रतिशत जल की बचत संभव है। बूँद-बूँद की बचत से एक बड़ी बचत हो सकती है। इस प्रकार पानी की बचत ही जल संरक्षण है।

 

जल संरक्षण का अर्थ पानी बर्बादी तथा प्रदूषण को रोकने से है। जल संरक्षण एक अनिवार्य आवश्यकता है। राज्य मे अपना संस्थान ने नागरिकों एवं सरकार से निवेदन किया है की भवन निर्माण मे आवश्यक अनिवार्यता लागू करे की वो  वर्षा जल का संरक्षण करे, क्योंकि वर्षाजल हर समय उपलब्ध नहीं रहता अतः पानी की कमी को पूरा करने के लिये पानी का संरक्षण आवश्यक है। यदि हमारे देश में वर्षाजल के रूप में प्राप्त पानी का पर्याप्त संग्रहण व संरक्षण किया जाए, तो यहाँ जल संकट को समाप्त किया जा सकता है।

राष्ट्रीय विकास में जल की महत्ता को देखते हुए ‘जल संरक्षण’ को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानते हुए *अपना संस्थान* निम्नलिखित आसान उपायों को करने के लिये जनजागरण अभियान चलाकर जल संरक्षण सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहा है,  क्योंकि जनसहभागिता से जल की बचत बड़े प्रभावी ढंग से की जा सकती है।

1. बच्चों, महिलाओं, पुरूषों को जल संरक्षण के महत्व व आवश्यकता से अवगत कराया जा रहा है ।
2. बाल्टी से स्नान/शौच आदि की आदत डालनी के प्रयास हेतु।
3. गाँवों में तालाबों को गहरा करके वर्षा जल संचित करने के प्रयास हेतु।
4. नगरों/महानगरों में घरों की नालियों का पानी गड्ढे में एकत्र करके इसे सिंचाई के काम में लेने के प्रयास हेतु।
5. घर की छत पर वर्षाजल का भंडारण करके इसे काम में लिया जाए।
6. घरों, सार्वजनिक स्थानों पर नल की टोंटियों की सुरक्षा की जाए ताकि पानी की बर्बादी को रोका जा सकने प्रयास हेतु।
7. समुद्री खारे जल को पेयजल व घरेलू उपयोग योग्य बनाने के लिये समुचित प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाए।(सरकार को आग्रह किया जाना है )
8. गंगा-यमुना , चम्बल जैसी सदानीरा नदियों की नियमित सफाई सुनिश्चित की जाए तथा इन्हें प्रदूषण मुक्त बनाया जाए।
9. वृक्षारोपण को हर स्तर पर प्रोत्साहित किया जाए।
10. विद्यालय की पाठ्यपुस्तकों में ‘जल संरक्षण’ एक विषय के रूप में पढ़ाया जाए ताकि बचपन से ही बच्चों में यह संस्कार स्वतः विकसित हो सके। इसे हर स्तर पर एक अनिवार्य विषय बना दिया जाए।
अपनी बहती नदीयो मे गंदगी प्रवाहित होने के कारण इनका प्रदूषण बढता है जो समुद्र को खारा करता है ।  यदि हम आपको बताये कि समुद्र का अपना जल खारा नही होता तो आप चैंकिए मत क्योंकि सिद्ध हो चुका है और  यह बात बिल्कुल सही है कि समुद्र का अपना जल जो कि भूजल से प्राप्त होता है , तथा लम्बे समय तक (लगभग 2000 वर्ष) समुद्र का हिस्सा बनकर रहता है , वह खारा नहीं होता है। फिर आप कहेंगे कि समुद्र का पानी खारा कैसे है? अनुसंधान कर्ताओ की खोज से आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि समुद्र में खारापन मूल रूप से नदियों की देन है। नदियाँ हर समय हल्का खारा पानी समुद्र में उड़ेलती रहती हैं तथा समुद्र में पानी के वाष्पीकरण के कारण नदियों से लाये हल्के खारे पानी का सान्द्रण होता रहता है। एक और रोचक बात यह है कि जिस तरह सभी जीव-जन्तुओं की उम्र होती है, उसी प्रकार पानी की भी उम्र होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि जीव-जन्तुओं की उम्र काफी कम होती है, जबकि पानी कई सौ हजार साल पुराना भी हो सकता है। हम आपको यह बात जल संरक्षण के बारे में बता रहे है।

जैसा कि आपको विदित ही है कि हमारे किसी भी शहर में 24 घंटे पानी की आपूर्ति नहीं है। ऐसी स्थिति में लोग पानी का भण्डारण अपनी आवश्यकता से अधिक करते हैं। क्योंकि उन्हें डर रहता है कि पता नहीं अब पानी कब आएगा? लेकिन जब कल पानी आता है तब हम पहले दिन वाला पानी बासी समझकर बहा देते हैं तथा ताजा पानी फिर भर कर रखते हैं। आपको बता दें कि हमारे जल की आपूर्ति में भूजल का हिस्सा जो कि गहरे नलकूपों द्वारा प्राप्त किया जाता है ,वह प्रायः 20-50 वर्ष पुराना होता है। अतः जल संरक्षण के लिये जरूरी है कि हम जनता को सही जानकारी दें जिससे वह जल का भण्डारण साफ-सफाई से करें एवं यदि पानी कई दिन पुराना भी है तो उसका इस्तेमाल किसी-न-किसी रूप में करें ना कि एक दिन पुराने पानी को बहाकर पानी का दुरुपयोग करें। 
निःसंदेह उपर्युक्त उपायों पर अमल करने से जल संरक्षण अभियान को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी तथा जल संकट से निपटने में यह एक सकारात्मक पहल होगी। इन सब के लिये अमृतादेवी पर्यावरण नागरिक संस्थान कृत संकल्प रहेगा।

सुरेश शर्मा
अपना संस्थान,जयपुर


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