भारत का वह 'स्मार्ट विलेज', जहां विदेशी भी आकर रहना चाहते हैं..

7 months ago
अपना संस्थान

इस गांव का नाम पिपलांत्री हैं। करीब 2 हजार से ज्यादा आबादी वाले ग्राम पंचायत की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे मॉडल बनाने में किसी सरकार या एजेंसी का हाथ नहीं बल्कि यहां के ग्रामीणों का है। कुछ साल पहले तक यह गांव भी उजाड़ था, पानी पाताल में चला गया था और खदानों की उड़ती धूल से लोगों का जीना मुहाल हो गया था। लेकिन अब दूर-दूर तक पेड़ हैं। हरियाली इतनी कि आसमान से इसरो की टीम को यह इलाका अलग ही नजर आया था। पानी भी लोगों की पहुंच में है। सबसे बड़ी बात ही हर दिन यहां भारत के किसी न किसी कोने से कोई पर्टयक, शोधकर्ता, ग्रामीण चला आता है। इतना ही नहीं कई विदेशी भी यहां डेरा डाले नजर आते हैं।



इस गांव में पिछले तीन महीने से अपनी एक डॉक्युमेंट्री फिल्म की शूटिंग कर रही अर्जेटीना की सोफिया बताती हैं,"मैं ये जानने को बहुत उत्सुक हूं कि कैसे इस गांव की महिलाओं की स्थिति इतनी बदल गई और कैसे यहां के लोग पेड़-पौधों को बचाकर पर्यावरण संरक्षण में जुटे हैं।' सोफिया अपने कुछ स्टूडेंट साथियों के साथ यहां तीन साल पहले पहली बार आईं थी, मुस्कुराते हुए सोफिया कहती हैं, "मुझे इस गांव से प्यार हो गया है।" सोफिया की तरह दर्जनों विदेशी लोग यहां हर महीने आते हैं। कुछ तो कई-कई महीने रुककर यहां हुए बदलाव को समझते हैं। गांव वाले भी अपने गांव की तरक्की से काफी खुश हैं।

"हमारे गांव के लोग इतने जागरुक हैं कि यहां बेटी के जन्म होने पर 111 पेड़ लगाएं जाते हैं और फिर वही बेटियां इन पेड़ों को भाई बनाकर राखी बांधती हैं, उन्हें बड़ा करती हैं। इससे पर्यावरण सुरक्षित हो रहा है, हमारे गांव की एक पहचान ये भी है कि पिपलांत्री की लड़कियां लड़कों से आगे हैं।" बीए में पढ़ने वाली मोनिका पॉलीवाल बताती हैं। मोनिका बिल्कुल वैसे ही इस गांव में रहती हैं जैसे शहरों और कस्बों में लोगों का रहन-सहन होता है। उनके मुताबिक शहरों जैसी सुविधाएं सब उनके गांव में हैं।



लेकिन पिपलांत्री की तस्वीर हमेशा से ऐसी नहीं थी। राजस्थान के हजारों गांवों की तरह यहां भी हालात बदतर थे। राजस्थान में उदयपुर से करीब 75 किलोमीटर आगे राजसमंद जिला पड़ता है। ये इलाका पूरी दुनिया में संगमरमर के लिए जाना जाता है। हाईवे के दोनों तरफ संगमरमर के बड़े-बड़े शोरुम हैं तो खदानों से आते पत्थरों से भरे ट्रक आपको 24 घंटे नजर आएंगे। आपके किचन और ऑफिस दफ्तर में संभव है राजसमंद के संगमरमर का कोई टुकड़ा जरुर लगा हो। अरबों रुपए की संगमरमर इंडस्ट्री से राजस्थान को करोड़ों रुपए का राजस्व मिलता है, लेकिन यही खनन इन गांवों के लिए मुसीबत बनता जा रहा है।

राजस्थान या फिर कह लो खनिज संपदा वाले दूसरे राज्यों की तरह अंधाधुंध खनन के चलते स्थिति बदतर हो गई थी। हरियाली गायब हो गई थी और लोग रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ जा रहे थे। लेकिन साल 2005 में पंचायत के चुनाव में जीतकर नए-नए सरपंच बने श्याम सुंदर पालीवाल ने यहां की तस्वीर बदल दी। उन्होंने जो सबसे पहला काम किया वो था गांव की हजारों एकड़ सरकारी जमीन को कब्जे से मुक्त करना और उस पर पेड़ लगवाना। इसके लिए उन्होंने पिपलंत्री जलग्रहण समिति बनाई।



समिति के सचिव और सुंदरलाल पालीवाल के सहयोगी भंवर सिंह सिसौदिया गांव कनेक्शन को बताते हैं, "खनन के चलते ये गांव लगभग मर गया था, जंगल नष्ट हो गया था, पानी खत्म हो गया था। आसपास की जो संगमरमर की खदानें थी वो 500-800 फीट गहरी चली गई थीं, पानी के अभाव में खेती खत्म हो गई। पालीवाल जी के सरपंच बनने के बाद सरकारी जमीन से कब्जा छुड़वाया गया, खदानों के आसपास बाउंड्री बनी और खूब पेड़ लगाए गए।"

भंवर सिंह आगे कहते हैं, पेड़ लगाना भी बड़ी बात नहीं थी बड़ी बात थी कि उन्हें बचाकर रखना और हर ग्रामीण को लगे ये पेड़ उसके हैं, इसलिए पेड़ को बेटियों से जोड़ दिया गया। कुछ हरियाली बढ़ी तो गांव के लोग भी मुहिम में साथ हो लिए अब किसी बेटी के जन्म होने पर यहां 111 पेड़ लगाए जाते हैं और किसी भी व्यक्ति की मौत होने पर 11 पेड़ रोपे जाते हैं।"



पिपलांत्री में अब तक करीब 4 लाख पेड़ लगाए जा चुके हैं। भंवर सिंह की मानें तो जो पानी कभी 800 फीट पर पहुंच गया था वो 40–50 फीट पर आ गया है। हरियाली बढ़ने से जंगली जानवर लौट आए हैं। इसके लिए गांव में छोटे-मोटे करीब सैकड़ों बांध बनाए गए हैं। ताकि बारिश के पानी को जहां-तहां रोकर ग्राउंट वाटर को रिचार्ज किया जा सके। श्यामसुंदर पालीवाल अब सरपंच नहीं है। लेकिन भारत के कई राज्यों के ग्राम प्रधान और सरपंच उनसे सीखने आते हैं कि कैसे अपने बल पर अपने गांव का विकास किया जाए। कैसे सरकारी संसाधनों का उपयोग समाज की बेहतरी के लिए किया जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत, अभिनेता अक्षय कुमार समेत कई बड़े लोग पिपलांत्री और श्याम सुंदर पालीवाल की सहारना कर चुके हैं। जल, जमीन और जंगल और बेटियां बचाने के लिए उन्हें कई सम्मान भी मिल चुके हैं।

गांव में सबसे बड़ा बदलाव महिलाओं की स्थिति में आया है। वो महिलाएं तो कभी घूंघट की आंड में रहती थी वो अब पंचायत में जाती हैं। विदेशियों से टूटीफूटी ही सही लेकिन अंग्रेजी में बात करती हैं। अपने गांव पर गर्व करती हैं। गांव निवासी कला (40 वर्ष) बताती हैं, "घर से बाहर निकलता तो दूर हम ज्यादातर वक्त घूंघट में रहते थे, लेकिन २००५ से पहले मैने कभी मतदान नहीं किया था। लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं।' अपनी चाची कला के पास बैठी रेखा कहती हैं, पिपलांत्री अब बहुत बदल गया है, अब तो लोग हमारे जैसा बनना चाहते हैं। हम सब लोग भी कोशिश करते हैं कि गांव की छवि ऐसी ही बनी रही।'

बदलाव और तरक्की गांव के हर छोर पर नजर आती है। गांव के लगभग सभी घर पक्के, नालियां पक्की और हर घर में शौचालय है। गांव की हर सड़क पर पेड़ लगे हैं। गांव का सरपंच बदल गया है लेकिन योजनाएं और तरक्की अपनी रफ्तार में हैं। ग्राम पंचायत कार्यालय में एक सरकारी कर्मचारी बैठता है जो ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं को मिलने वाली दिक्कतों को दूर करता है। गांव के लोगों को गांव में ही रोजगार देने के लिए भी प्रयास किए गए हैं। पिपलांत्री के अपने एलोवेरा उत्पाद हैं। जिन्हें गांव की महिलाएं ही उगाती हैं और वही इसे प्रोसेज कर उत्पाद बनाती हैं।

श्याम सुंदर पालीवाल अक्सर संबोधनों में लोगों से कहते हैं, सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाएं हैं। सरकारी मशीनरी है, सरकार का पैसा है,सरकार की ही जमीनें हैं। मैने अपनी तरफ से कुछ नहीं किया। सिर्फ सरकारी योजनाओं को सही तरीके से लागू कराया और सरकारी बजट का सही इस्तेमाल किया है। जो भी ग्राम पंयायतें या सरपंच ऐसा कर रहे हैं उनके भी गांव पिपलांत्री की तरह खुशहाल हैं।"

by: Arvind Shukla  06 October 2018.



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