पीएम मोदी की कलम से: वर्तमान के प्रयासों में निहित है पर्यावरण संरक्षण का भविष्य

4 months ago
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नरेंद्र मोदी

संयुक्त राष्ट्र ने कल मुझे ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ अवॉर्ड’ से सम्मानित किया। यह सम्मान प्राप्त करके मैं बहुत अभिभूत हूं, लेकिन महसूस करता हूं कि यह पुरस्कार किसी व्यक्ति के लिए नहीं है। यह भारतीय संस्कृति और मूल्यों की स्वीकृति है, जिसने हमेशा प्रकृति के साथ सौहार्द बनाने पर बल दिया है। पर्यावरण संरक्षण में भारत की सक्रिय भूमिका को मान्यता मिलना और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस तथा यूएनईपी के कार्यकारी निदेशक इरिक सोलहिम द्वारा भारत की भूमिका की प्रशंसा करना प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का क्षण है।

मानव और प्रकृति के बीच विशेष संबंध

मानव और प्रकृति के बीच विशेष संबंध रहे हैं। प्रकृति माता ने हमारा पालन-पोषण किया है। प्रारंभिक सभ्यताएं नदियों के तट पर स्थापित हुईं। प्रकृति के साथ सौहार्दपूर्ण तरीके से रहने वाले समाज फलते-फूलते हैं और समृद्ध होते हैं। मानव समाज आज एक महत्वपूर्ण चौराहे पर खड़ा है। हमने जो रास्ता तय किया है वह न केवल हमारा कल्याण निर्धारित करेगा, बल्कि हमारे बाद इस ग्रह पर आने वाली पीढ़ियों को भी खुशहाल रखेगा। लालच और आवश्यकताओं के बीच असंतुलन ने गंभीर पर्यावरण असंतुलन पैदा कर दिया है। हम या तो इसे स्वीकार कर सकते हैं या पहले की तरह ही चल सकते हैं या सुधार के उपाय कर सकते हैं। इन बातों से यह निर्धारित होगा कि कैसे एक समाज सार्थक परिवर्तन ला सकता है।

प्रकृति के प्रति सम्मान

पहली आंतरिक चेतना है। इसके लिए अपने गौरवशाली अतीत को देखने से बेहतर कोई स्थान नहीं हो सकता। प्रकृति के प्रति सम्मान भारत की परंपरा के मूल में है। अथर्ववेद में पृथ्वी सूक्त शामिल है जिसमें प्रकृति और पर्यावरण के बारे में अथाह ज्ञान हैं। इसे अथर्ववेद में बहुत ही सुंदरता के साथ लिखा गया है। ‘यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टय: संबभूवु:। यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा नो भूमि: पूर्वपेये दधातु।’ अर्थात माता पृथ्वी अभिनंदन। उनमें सन्निहित हैं महासागर और नदियों का जल, उनमें सन्निहित है भोजन जो भूमि की जुताई द्वारा वे प्रकट करती हैं, उनमें निश्चित रूप सभी जीवन समाहित हैं, वे हमें जीवन प्रदान करें।

ऋषियों ने पंचतत्व- पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, आकाश के बारे में लिखा है और यह बताया है कि किस तरह हमारी जीवन प्रणाली इन तत्वों की समरसता पर आधारित है। प्रकृति के तत्वों से अलौकिकता प्रकट होती है।



‘आस्था का सिद्धांत’

महात्मा गांधी ने पर्यावरण के बारे में बहुत गहराई से लिखा है। उन्होंने ऐसी जीवन शैली को व्यवहार में उतारा, जिसमें पर्यावरण के प्रति भावना प्रमुख है। उन्होंने ‘आस्था का सिद्धांत’ प्रतिपादित किया, जिसने हमें यानी वर्तमान पीढ़ी को यह दायित्व दिया है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक स्वच्छ धरा प्रदान करें। उन्होंने युक्तिसंगत खपत का आह्वान किया, ताकि विश्व को संसाधनों की कमी का सामना न करना पड़े। समरस जीवन शैली का पालन करना हमारे लोकाचार का अंग है। जब हमें अनुभव होगा कि हम एक समृद्ध परंपरा के ध्वज-वाहक हैं, तब हमारे कार्यकलाप पर अपने आप सकारात्मक प्रभाव पड़ने लगेगा। दूसरा पक्ष जन जागरण का है। हमें पर्यावरण संबंधी प्रश्नों पर यथासंभव बातचीत करने, लिखने, चर्चा करने की आवश्यकता है। इसके साथ पर्यावरण संबंधी विषयों पर अनुसंधान और नवाचार को प्रोत्साहन देना भी महत्वपूर्ण है। इस तरह अधिक से अधिक लोगों को हमारे समय की गंभीर चुनौतियों को जानने और उन्हें दूर करने के प्रयासों के बारे में सोचने का अवसर मिलेगा। जब हम एक समाज के रूप में पर्यावरण संरक्षण से अपने मजबूत रिश्तों के बारे में जागरूक होंगे और उसके बारे में नियमित रूप से चर्चा करेंगे, तब सतत पर्यावरण की दिशा में हम स्वयं सक्रिय हो जाएंगे। इसीलिए सकारात्मक बदलाव लाने के लिए मैं सक्रियता को तीसरे पक्ष के रूप में रखता हूं।

इस संदर्भ में मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि भारत के 130 करोड़ लोग स्वच्छ और हरित पर्यावरण की दिशा में सक्रिय हैं और उसके लिए बढ़-चढ़कर काम कर रहे हैं।



स्वच्छ भारत मिशन

स्वच्छ भारत मिशन में हम यह अग्रसक्रियता देखते हैं जो भविष्य में सतत विकास से सीधे जुड़ी है। देशवासियों के आशीर्वाद से साढ़े आठ करोड़ आवासों की पहली बार शौचालयों तक पहुंच बनी है और 40 करोड़ से अधिक भारतीयों को अब खुले में शौच करने की आवश्यकता नहीं है। स्वच्छता का दायरा 39 प्रतिशत से बढ़कर 95 प्रतिशत हो गया है। प्राकृतिक परिवेश पर दबाव कम करने की खोज में यह ऐतिहासिक प्रयास है। उज्ज्वला योजना में भी हम यही अग्रसक्रियता देखते हैं जिसकी वजह से घरों में होने वाला वायु प्रदूषण बहुत कम हुआ है, क्योंकि भोजन पकाने की अस्वस्थ विधियों से स्वास्थ्य संबंधी रोगों में काफी बढ़ोतरी हो रही थी। अभी तक पांच करोड़ से अधिक उज्ज्वला कनेक्शन बांटे जा चुके हैं और इसकी वजह से महिलाओं और उनके परिवारों के लिए एक बेहतर और स्वच्छ जीवन सुनिश्चित हुआ है।



‘नमामि गंगे मिशन’ 

भारत अपनी नदियों की सफाई करने की दिशा में काफी तेजी से बढ़ रहा है। भारत की जीवन रेखा कही जाने वाली नदी गंगा कई हिस्सों में काफी प्रदूषित हो चुकी थी और ‘नमामि गंगे मिशन’ के जरिये इसकी व्यापक साफ-सफाई को अंजाम दिया जा रहा है। सीवेज के उपयुक्त निपटारे पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। हमारे शहरी विकास प्रयासों- अमृत और स्मार्ट सिटी मिशन का मूल तत्व शहरी क्षेत्रों में होने वाली वृद्धि और पर्यावरण देखभाल में संतुलन बनाना है। किसानों को बांटे गए 13 करोड़ से अधिक मृदा स्वास्थ्य कार्डों से उन्हें काफी लाभ हो रहा है और इससे जमीन की उत्पादकता व उसकी पोषकता में बढ़ोतरी होगी जिससे आने वाली पीढ़ियों को मदद मिलेगी।

पर्यावरण के क्षेत्र में कुशल रोजगार

पर्यावरण क्षेत्र में कौशल भारत में हमने समन्वित उद्देश्य अपनाए हैं और विभिन्न योजनाओं जिनमें हरित कौशल विकास कार्यक्रम शामिल है, की शुरुआत की है जिससे पर्यावरण, वानिकी, वन्यजीव और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में वर्ष 2021 तक 70 लाख युवाओं को कुशल बनाना है। इससे पर्यावरण क्षेत्र में कुशल रोजगारों और उद्यमिता के लिए अनेक अवसर पैदा होंगे। हमारा देश नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्नोतों पर विशेष ध्यान दे रहा है और पिछले चार वर्षों में यह क्षेत्र काफी सुगम और वहन करने योग्य बन गया है। उजाला योजना के तहत देशभर में करीब 31 करोड़ एलईडी बल्ब बांटे गए। इस योजना की वजह से जहां एक तरफ एलईडी बल्बों की कीमतें कम हुई वहीं बिजली के बिलों और कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आई।

सौर ऊर्जा की क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल

भारत की पहल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखी जा रही है। मुझे इस बात का गर्व है कि भारत पेरिस में 2015 में हुई सीओपी-21 वार्ता में आगे रहा है। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की शुरुआत के मौके पर मार्च, 2018 में दुनिया के कई देशों के नेता नई दिल्ली में इकट्ठा हुए। यह गठबंधन सौर ऊर्जा की क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल करने की एक पहल है। इसके जरिये दुनिया के उन देशों को साथ लाने का प्रयास किया गया है जहां सूरज की ऊर्जा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। ऐसे समय में जबकि दुनिया में जलवायु परिवर्तन की बात हो रही है भारत से जलवायु न्याय का आह्वान किया गया है। जलवायु न्याय का अर्थ समाज के उन गरीब और हाशिये पर खड़े लोगों के अधिकारों और हितों से जुड़ा है जो जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

पर्यावरण के प्रति जागरूकता

जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है, हमारी आज की गतिविधियों का प्रभाव आने वाले समय की मानव सभ्यता पर भी पड़ेगा और यह अब हम पर निर्भर करता है कि सतत भविष्य के लिए वैश्विक जिम्मेदारी की शुरुआत हम ही करें। विश्व को पर्यावरण के क्षेत्र में एक ऐसी मिसाल की तरफ बढ़ने की आवश्यकता है जो सिर्फ सरकारी नियमों तथा कानूनों तक ही न हो, बल्कि इसमें पर्यावरण जागरुकता भी हो। इस दिशा में जो व्यक्ति और संगठन लगातार मेहनत कर रहे हैं, मैं उन्हें बधाई देना चाहूंगा क्योंकि वे हमारे समाज में चिरस्मरणीय बदलाव के अग्रदूत बन चुके हैं। इस दिशा में उनके प्रयत्नों के लिए मैं सरकार की ओर से हर तरह की मदद का आश्वासन देता हूं। हम सब मिलकर एक स्वच्छ पर्यावरण बनाएंगे जो मानव सशक्तीकरण की दिशा में आधारशिला होगी।


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